देश में बिजली की बढ़ती मांग के बीच कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में ईंधन की उपलब्धता एक बार फिर चर्चा में है। 21 अक्टूबर 2026 को सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 191 कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में से 96 के पास 19 अक्टूबर तक कोयले का भंडार गंभीर स्तर पर था। सितंबर के मध्य में ऐसे संयंत्रों की संख्या 60 थी। गर्म मौसम के कारण बिजली की खपत बढ़ने और जलविद्युत उत्पादन में गिरावट ने बिजली व्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है। हालांकि, कम कोयला भंडार का मतलब यह नहीं है कि देशभर में बिजली कटौती होना तय है। असली स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले दिनों में कोयले की आपूर्ति और बिजली की मांग के बीच कितना संतुलन बना रहता है।
96 बिजली संयंत्रों में कोयले का स्टॉक क्यों बना चिंता का विषय?
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के आंकड़ों के आधार पर सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, 19 अक्टूबर तक 96 बिजली संयंत्रों में कोयले का भंडार निर्धारित गंभीर स्तर पर पहुंच गया था। इन संयंत्रों के पास सामान्य मानकों के हिसाब से तीन दिन से कम बिजली उत्पादन के लिए पर्याप्त कोयला बचा था। सितंबर के मध्य में ऐसे संयंत्रों की संख्या 60 थी, यानी एक महीने से कुछ अधिक समय में इस श्रेणी में आने वाले बिजली घरों की संख्या बढ़ गई। यहां एक बात समझना जरूरी है। बिजली संयंत्रों को गंभीर स्टॉक की श्रेणी में रखने का उद्देश्य संभावित कमी के बारे में पहले से चेतावनी देना है। इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि संयंत्रों में कोयला पूरी तरह खत्म हो चुका है या उनका उत्पादन तुरंत बंद होने वाला है। फिर भी, अगर कम भंडार वाले संयंत्रों तक समय पर ईंधन नहीं पहुंचता, तो बिजली उत्पादन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
बिजली की मांग में बढ़ोतरी ने बढ़ाया दबाव
भारत में बिजली की खपत पर मौसम का सीधा असर पड़ता है। तापमान अधिक रहने पर घरों, दफ्तरों और दुकानों में पंखे, कूलर तथा एयर कंडीशनर का इस्तेमाल बढ़ जाता है। इसके साथ ही उद्योगों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और कृषि क्षेत्र को भी लगातार बिजली की जरूरत होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल रोजाना बिजली की अधिकतम मांग पिछले साल की तुलना में लगभग 45 से 50 गीगावाट अधिक रही है। इतनी बड़ी मांग को पूरा करने के लिए बिजली उत्पादन और ईंधन की आपूर्ति के बीच तालमेल बनाए रखना जरूरी है। यदि बिजली की खपत तेजी से बढ़े और कोयले की आपूर्ति उसी गति से न बढ़े, तो संयंत्रों के भंडार पर दबाव पड़ सकता है।
कमजोर मानसून और जलविद्युत उत्पादन में गिरावट का क्या है संबंध?
बिजली व्यवस्था पर दबाव बढ़ने की एक वजह जलविद्युत उत्पादन में गिरावट भी बताई गई है। कमजोर मानसून के कारण जलाशयों में पानी की उपलब्धता और उससे बिजली बनाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में मांग पूरी करने के लिए कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों पर निर्भरता बढ़ जाती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में कोयले से बिजली उत्पादन पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 13.3 प्रतिशत बढ़ा, जबकि जलविद्युत उत्पादन में 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसी महीने बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़कर 560 मिलियन किलोवाट-घंटे तक पहुंच गया, जो अगस्त 2023 के बाद सबसे बड़ा अंतर बताया गया। ये आंकड़े बताते हैं कि बिजली व्यवस्था को केवल अधिक उत्पादन की ही नहीं, बल्कि अलग-अलग ऊर्जा स्रोतों के बीच बेहतर संतुलन की भी जरूरत है।
क्या देश में बिजली कटौती होने वाली है?
कोयले के कम भंडार की खबर के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आम लोगों को बिजली कटौती का सामना करना पड़ेगा। फिलहाल उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर पूरे देश में बिजली कटौती की निश्चित भविष्यवाणी करना सही नहीं होगा। किसी बिजली संयंत्र में कम कोयला होने और किसी शहर में बिजली कटौती होने के बीच सीधा संबंध मान लेना भी ठीक नहीं है। वास्तविक स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि संयंत्र कितना उत्पादन कर रहा है, उसे कितनी जल्दी कोयला मिल रहा है, बिजली की मांग कितनी है और संबंधित क्षेत्र में अन्य स्रोतों से कितनी बिजली उपलब्ध है। यदि किसी क्षेत्र में मांग और उपलब्ध आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ता है, तो वहां बिजली व्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर राज्य या शहर में एक जैसी स्थिति बनेगी। स्थानीय बिजली कटौती की जानकारी के लिए संबंधित बिजली वितरण कंपनी की आधिकारिक सूचनाएं देखना ज्यादा उपयोगी रहेगा।
सरकार ने कोयले की सप्लाई को लेकर क्या बताया?
कोयले के भंडार को लेकर सामने आई चिंताओं के बीच कोयला मंत्रालय ने अक्टूबर में कहा था कि बिजली संयंत्रों तक आपूर्ति बढ़ाने के कदम उठाए गए हैं। मंत्रालय की 9 अक्टूबर की जानकारी के अनुसार, सितंबर के निचले स्तर की तुलना में बिजली क्षेत्र को रोजाना कोयले की आपूर्ति में लगभग 36 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। अक्टूबर में आपूर्ति सितंबर के औसत से करीब 9 प्रतिशत अधिक बताई गई थी। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि ‘क्रिटिकल स्टॉक’ की श्रेणी में शामिल होना अपने आप में इस बात का संकेत नहीं है कि किसी संयंत्र का ईंधन खत्म हो गया है या उसका उत्पादन तत्काल बंद होने वाला है। ऐसे संयंत्रों की निगरानी की जाती है और जरूरत के अनुसार कोयले का वितरण किया जा सकता है। 12 अक्टूबर को जारी एक अन्य सरकारी अपडेट में बताया गया था कि घरेलू कोयला आधारित बिजली संयंत्रों का कुल स्टॉक 10 अक्टूबर को 18.205 मिलियन टन था। मंत्रालय के मुताबिक, रेलवे के जरिए कोयला भेजने की गति बढ़ने से आपूर्ति में सुधार हुआ था। हालांकि, बाद में सामने आए 19 अक्टूबर के आंकड़ों में गंभीर स्टॉक वाले संयंत्रों की संख्या बढ़ी हुई दिखाई दी। इससे पता चलता है कि कुल आपूर्ति में सुधार के बावजूद कुछ बिजली घरों में स्टॉक की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी रह सकती है।
कोयले की कमी का आम लोगों के बिजली बिल पर क्या असर पड़ेगा?
कोयले की आपूर्ति पर दबाव का असर बिजली उत्पादन की लागत और बिजली कंपनियों के कामकाज पर पड़ सकता है। लेकिन केवल कम कोयला स्टॉक की खबर के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि घरेलू बिजली बिल तुरंत बढ़ने वाले हैं। बिजली की दरें कई कारकों से प्रभावित होती हैं, जिनमें ईंधन की लागत, बिजली खरीदने का खर्च, वितरण व्यवस्था और राज्य के विद्युत नियामक आयोग के फैसले शामिल हैं। यदि बिजली उत्पादन महंगा होता है या आपूर्ति में परेशानी आती है, तो उसका असर अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकता है। उपभोक्ताओं को फिलहाल बिजली बिल बढ़ने या तय समय पर बिजली कटौती होने से संबंधित अपुष्ट संदेशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। किसी बदलाव की जानकारी संबंधित बिजली कंपनी या राज्य के नियामक प्राधिकरण की आधिकारिक घोषणा से ही लेनी चाहिए।
बिजली की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने के लिए क्या जरूरी है?
बिजली संयंत्रों में पर्याप्त कोयला पहुंचाने के लिए खदानों से उत्पादन, रेलवे के जरिए परिवहन और बिजली घरों तक समय पर आपूर्ति महत्वपूर्ण है। यदि इन चरणों में कहीं देरी होती है, तो कुछ संयंत्रों का भंडार तेजी से कम हो सकता है। सरकार और संबंधित एजेंसियों के सामने चुनौती यह है कि जरूरतमंद बिजली घरों तक समय पर कोयला पहुंचाया जाए और अधिक मांग वाले समय में उत्पादन प्रभावित न हो। इसके लिए कोयला कंपनियों, रेलवे, बिजली मंत्रालय और राज्य की बिजली कंपनियों के बीच समन्वय जरूरी है। लंबे समय में सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्रोतों का विस्तार, ऊर्जा भंडारण की सुविधाएं और बेहतर बिजली ग्रिड भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, इन स्रोतों से उत्पादन मौसम और समय के अनुसार बदलता है। इसलिए मांग बढ़ने के समय पर्याप्त बिजली उपलब्ध रखने के लिए अलग-अलग ऊर्जा स्रोतों और भंडारण व्यवस्था का संतुलित इस्तेमाल जरूरी है।
आगे बिजली व्यवस्था पर रहेगी सबकी नजर
देश के 191 कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में से 96 के गंभीर स्टॉक श्रेणी में आने की खबर ऊर्जा व्यवस्था के लिए सतर्क रहने का संकेत है। बढ़ती बिजली मांग, गर्म मौसम और जलविद्युत उत्पादन में गिरावट ने कोयले की उपलब्धता को और महत्वपूर्ण बना दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना जरूरी होगा कि कोयले की आपूर्ति किस गति से जारी रहती है और कम भंडार वाले बिजली संयंत्रों की स्थिति में कितना सुधार होता है। फिलहाल इसे देशभर में बिजली कटौती की पक्की घोषणा मानना सही नहीं होगा। वास्तविक स्थिति समझने के लिए सरकारी आंकड़ों और स्थानीय बिजली कंपनियों के अपडेट पर नजर रखना सबसे बेहतर तरीका है।
